झंकार

बाँबी की शुष्क मिट्टी केअन्तः अश्रुओं के सिंचन सेपहली बार विकसे पुष्प! मानव वंश की सुषुम्ना के छोर परआनन्द रूपी पुष्पित पुष्प! हजारों नुकीली पंखुड़ियों से युक्त होदस हजार वर्षों से सुसज्जित पुष्प! आत्मा को सदाचिर युवा बनाने वालेविवेक का अमृत देने वाले पुष्प!सुश्वेत कमल पुष्प!तू निरन्तर सौरभ का कर संचार मैं इसे ग्रहण कर … Read more

घास

खिले पुष्पों से आच्छादित भूमि मेंअतीत में ही पैदा हुआ मैं घास बनकरउस वक़्त भी आवाज़ सुनीतुम्हारी बांसुरी कीमधुर रोमांच से खुल गई आँखे आत्मा की आँखें खुलने परआश्चर्य से शिथिल हो गया मैंउस रोमांच की लहर से ही तो मैंआकाश तक विस्तृत हो सकाउत्तुंग मेरा मुख आकाशगंगा कीखंडित माला में संविलीन हो गया । … Read more

पिता की विवशता

पीली, उभरी हुई, चूने जैसी आँखें घुमातेचाँदी के तारों-सी दाढ़ी मूंछे सँवारेफटे हुए वस्त्रों वाले एक बाबाजीप्रातः सूर्य की किरणों के पीछे-पीछेमेरे घर आ पहुंचे। अल्प संकोच के साथ उन्होंने एक मुस्कान फेंकीअक्षर-ज्ञान विहीन मेरे बेटे ने उनसे कुछ कहा।बेटे के हाथ की चमड़े की गेंद में हो गये छेद कोदेख चुके आगन्तुक ने तभीअपनी … Read more

पतंगों से

आग में कूदकर मरने के लिए याआग खाने की लालसा मेंआग की ओर समूह मेंदौड़े जा रहे हैं छोटे पतंगे? आग में कूद कर मर जाने ले लिए हीदुनिया में बुराइयाँ होती हैं क्या? पैदा होते हीभर गई निराशा कैसे? खाने के लिए ही है यह जलती हुई आगयदि तुम यही सोच रहे होतो फिर … Read more

प्राणायाम

प्रिये! ऐसा लगता है कि हैकिन्तु है नहीं यह ब्रह्मांड,प्रिये! है नहीं,ऐसा लगने पर भीयह ब्रह्मांड तो है ही। आँसुओं से सानकर बनाए गयेएक मिट्टी के लोंदे परज़ोरों से पनपता हैहमारे पूर्व जन्म के सौहार्द का आवेश। प्रत्येक घड़ी,प्रत्येक पल,एक नवांकुर,प्रत्येक अंकुर की शाखा पर खिलतीएक नयी रोशनी,प्रत्येक रोशनीस्नायु-जाल के लिए एक पुराना विषाद है,प्रत्येक … Read more

परम दु:ख

कल आधी रात में बिखरी चाँदनी मेंस्वयं को भूलउसी में लीन हो गया मैंस्वतः हीफूट फूट कर रोया मैंनक्षत्र व्यूह अचानक ही लुप्त हो गया । निशीथ गायिनी चिड़िया तक नेकारण न पूछाहवा भी मेरे पसीने की बून्दें न सुखा पाई । पड़ोस के पेड़ सेपुराना पत्ता तक भी न झड़ादुनिया इस कहानी कोबिल्कुल भी … Read more